श्रीगंगानगर/लम्पी स्किन डिजीज से मृत गौवंश को खुले, हड्डारोड़ी में नहीं छोड़ें*

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इंडियन न्यूज श्री गंगानगर संवाददाता पवन कुमार जोशी

*लम्पी स्किन डिजीज से मृत गौवंश को खुले, हड्डारोड़ी में नहीं छोड़ें*

*-जिला कलक्टर ने जारी की अपील*

श्रीगंगानगर जिला कलक्टर श्रीमती रूक्मणि रियार सिहाग ने पशुओं में फैल रही संक्रामक बीमारी लम्पी स्किन डिजीज से मृत गौवंश को खुले, हड्डारोड़ी में नहीं छोड़ने की अपील जारी की है। उन्होंने मृत गौवंश का निस्तारण गड्डे में दबाकर करने की अपील की है।

 

 

 

 

 

जिला कलक्टर ने बताया कि जिले के गौवंश में लम्पी स्किन डिजीज के कारण गौवंश की मृत्यु हो रही है। बीमारी से मृत गौवंश को पशुपालकों द्वारा खुले में अथवा हड्डारोड़ी पर छोड़ा जा रहा है। इससे संक्रमण फैलने की आशंका बढ़ रही है। इस संबंध में जिला कलक्टर ने जिला परिषद के सीईओ, आयुक्त नगरपरिषद श्रीगंगागनर और जिले की सभी नगरपालिकाओं के अधिशाषी अधिकारियों को निर्देशित किया है कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रा में बीमारी से मृत पशुओें का निस्तारण गड्डे में दबाकर करवाने में सहयोग करें, जिससे संक्रमण फैलाव की संभावना कम हो सके। साथ ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों को इस संबंध में जागरूक भी किया जाये।

 

 

 

 

 

इसी क्रम में जिला कलक्टर ने अपील की है कि छोटे बच्चों को गर्म करने के बाद दूध का सेवन करवाया जाये। अगर कोई पशु लम्पी डिजीज से संक्रमित है, तो उसे अन्य स्वस्थ पशुओं से दूर रखा जाये ताकि संक्रमण के फैलाव की संभावना कम हो सके।

*पशुओं में लम्पी स्किन डिजीज लक्षण व उपचार*
लम्पी स्किन डिजीज गायों एवं भैंसों में तेजी से फैलने वाला एक वायरस जनित रोग है। इस रोग से सभी उम्र के पशु प्रभावित होते हैं। जिले के बहुत से गाय एवं भैंसों में इस रोग का प्रकोप पाया गया है। यह एक प्रकार का संक्रामक रोग है, जो कि वायरस के कारण होता है। यह रोग केवल पशुओं में ही पाया जाता है। चीचड,मक्खी एवं मच्छर इस रोग के प्रमुख वाहक है।

*लक्षण*
इस रोग प्रकोप में पशुओं के पूरे शरीर पर त्वचा पर छोटी-छोटी गांठें हो जाती हैं। रोग की शुरूआत पशु में तेज बुखार (103 से 105 डिग्री फेरनहाईट) होता है। कुछ पशुओं में पैरों पर सूजन आ जाती है, नाक से एवं आंखों से पानी आना शुरू हो जाता है।

 

 

 

*उपचार*
यह रोग 10-15 दिन बाद पशु की रोग प्रतिरोधक क्षमता के अनुसार स्वतः ही ठीक हो जाता है, वायरस पर कोई दवा असर नहीं करती है। तेज बुखार एवं अन्य लक्षणों के आधार पर कमजोर पशु एवं उच्च दुग्ध क्षमता वाले पशुओं को नजदीकी पशु चिकित्सक को दिखा कर उपचार करावें।

 

 

 

*बचाव*
संक्रमण से बचने हेतु पशुओं के आवास गृह को साफ-सुथरा रखें। चीचड़ एवं अन्य परजीवियों से पशु को बचा कर रखें। नीम के पत्तों का पशुओं के आवास गृह व बांधने के स्थान पर धुआं करें। रोग ग्रस्त पशुओं को स्वस्थ पशुओं से दूर रखें।

*विशेष सावधानी*
यह देखने में आ रहा है कि पशुपालकों द्वारा बीमारी से मृत पशु को सड़क किनारे, खुले स्थानों पर या फिर नहरों में डाला जा रहा है, जो कि उचित नहीं है। इससे रोग अधिक तेजी से फैलने की सम्भावना रहती है। इससे पशुधन को अधिक नुकसान होगा। पशुपालकों को सलाह दी जाती है कि इस बीमारी से मृत पशु को गड्डा खोदकर नमक इत्यादि डालकर दबा देवें जिससे वायरस संक्रमण न फैले।

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